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बिना श्रद्धा अपूर्ण है श्राद्ध

श्राद्ध कर्म भावना प्रधान है बिना श्रद्धा भाव से किए गए श्राद्ध का कोई मूल्य नहीं होता। यदि आप आर्थिक तौर पर सक्षम नहीं है तो यह जरूरी नहीं कि 11 या 21 ब्राह्मण को भोजन करवाएं, एक ब्राह्मण को भी भोजन करवा सकते हैं। छप्पन भोग नहीं केवल दूध व चावल की खीर ही उन्हें तृप्ति प्रदान कर सकती हैं। इसीलिए शास्त्रों में लिखा है कि यदि श्राद्धकर्ता के पास इतना धन नहीं कि वह एक ब्राह्मण को भी भोजन करवा सकें, उसे दान दक्षिणा सहित विदा कर सके तो विष्णु पुराण के अनुसार श्राद्धकर्ता ब्राह्मण को कुछ भी धन या दक्षिणा दे सकता है और यदि इतना भी संभव नहीं हो तो ब्राह्मण को प्रणाम कर केवल मुठ्ठी भर तिल ही दे दें। इसका भी अभाव हो तो विनम्र भाव से सात-आठ तिलों से पृथ्वी पर जलांजलि दे दें या गाय को हरा चारा खिला दंे और इतना भी न हो तो दक्षिण दिशा में हाथ ऊपर उठा कर पितरों को प्रमाण करें और कहें कि आप मेरी भक्ति से ही तृप्त हो जाएं, मैं आपको प्रणाम करता हूं। इन भावनाओं से ही आपके पितृ तृप्त हो जाएंगे। लेकिन जो सक्षम है उन्हें पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध कर्म और तर्पण कर पितरों को मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

एक व्यक्ति जीवन में क्या चाहता है? पुत्र-पौत्र, परिवार का सुख, यश-कीर्ति, शक्ति, सुख-समृद्धि और शांति। व्यक्ति समझ आने से लेकर अपनी साम्र्थय रहने तक इन्हीं की प्राप्ति के लिए निंरतर संघर्ष और प्रयत्न करता है। आज विज्ञान और तकनीक के युग में तो समृद्धि और शांति दोनों ही दुर्लभ होते जा रहे हैं और वह येन-केन, प्रकारेण इन्हें प्राप्त करने के प्रयत्न करता रहता है। अगर आपको यह सब कुछ प्राप्त करना है तो आप एक काम कीजिए-जीते जी माता-पिता की सेवा करें और उनके मरणोपरांत उनको श्राद्ध के माध्यम से तृप्त करें। फिर देखिए, ये सारे सुख आपके जीवन में स्वतः दौड़े चले आएंगे। आपमें होनी चाहिए सच्ची श्रद्धा, क्योंकि श्रद्धा के बिना श्राद्ध अधूरा है। केवल श्रद्धा, आस्था और माता-पिता के प्रति श्रेष्ठ भाव मन में हैं तो जीवन में आपके लिए कोई कार्य दुष्कर नहीं। पितरों की कृपा और उनका आशीर्वाद आपके जीवन की बाधाओं का खात्मा कर आपको सफलता की ओर अग्रसर कर सकता है। इसके लिए चाहिए मन में सच्ची श्रद्धा।