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वृक्षों, पौधों को किस अपराध की सजा?

वृक्षों के बिना तो किसी के भी जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। हमें वृक्षों, पौधों, लताओं, हरियाली से गहरा संबंध है। जरा अपने आस-पास, इधर-उधर देखिए- जो वृक्ष अपनी छाया से सूर्य के तेज ताप से बचाते है, वर्षा की तेज बोछारे, ओलों की मार, आंधी-तूफान की झपट को सहते है निरोग-स्वस्थ रखते है, जिनमें देवता तक से संबंध है क्या इन्हें सुरक्षित, हरा-भरा, पल्लवित रखा जा रहा है?

पृथ्वी-पर्वत, चट्टान नाले, टीले, मैदान, समुन्द्र, आकाश, मेघ नक्षत्र इत्यादि की रूप गति आदि से भी हम सौन्दर्य, माधुर्य, भीषणता, भव्यता, विचित्रता, उदासी, उदारता, सम्पन्नता इत्यादि की भावना प्राप्त करते है। कड़कडाती धूप के पीछे उमड़ती हुई घटा की श्यामल तथा शीतलता का अनुभव मनुष्य क्या पशु-पक्षी पेड़ पौधे तक करते है।

जब वटवृक्ष ही न हो तो कैसा वट सावित्री व्रत? जब वृक्ष हरे-भरे न हो, हरियाली न हो तो कैसी श्रावणी तीज यानी हरियाली तीज, जब तुलसी का पौधा न हो तो कैसा तुलसी विवाह, कैसी तुलसी एकादशी? जब देवी-देवों को अर्पित करने के लिए पत्र, पुष्प, फल ही न हों तो कैसा अर्पण? कैसी लोहड़ी, कैसा अन्नकूट? अन्य भी बहुत कुछ।

एक दृश्य- कोसों तक फैले, कड़ी धूप से तपते मैदान के बीच एक अकेला वटवृक्ष दूर तक छाया फैलाये खड़ा है। हवा के झोंको से उसकी टहनियां तथा पत्ते हिल हिलकर मानों बुला रहें है। हम धूप से व्याकुल होकर उसकी ओर बढ़ते है। देखते है उसकी जड़ के पास एक गाय बैठी आंख मूंदे जुगाली कर रही है। हम लोग भी उसी के पास आराम से जा बैठते है। इतने में एक कुत्ता जीभ बाहर निकाले हांफता हुआ उस छाया के नीचे आता है तो हममें से कोई उठकर उसे छड़ी लेकर भगाने लगता है। क्या ऐसा करना उचित है? वृक्ष के लिए सभी समान भाव है उसने अपनी छाया का कभी बटवारा नहीं किया फिर कोई व्यक्ति ऐसा क्यों करे जो वृक्ष को भी अप्रिय है?

जैसे वर्षा का स्वामी चन्द्रमा, ग्रीष्म ऋतु का स्वामी मंगल, शरद वसन्त ऋतु का स्वामी बुध है, हेमंत ऋतु का स्वामी गुरु, वसन्त ऋतु का स्वामी शुक्र, इसी तरह कई वृक्ष पौधों से तथा फूल पत्तियों से देवी देवों का भी संबंध है। देवी लक्ष्मी को कमल पसंद है तो देवाधिदेव शिव को आक धतूरे के फूल बिल्ब पत्र पसंद है पीपल वृक्ष में तो देवताओं का वास होने से इसे देव वृक्ष कहा जाता है।

यदि पुराणों के माध्यम से वृक्षों के महत्व को जाने तो स्कन्द पुराण में कहा गया है कि वृक्षों में देवताओं का आवास है। यथा पीपल के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु, शिव तीनों देवताओं का वास बताया गया है तदर्थ पीपल समस्त भारत की लोक संस्कृति के साथ जुड़ गया वट, नारियल, अशोक, आम्र तथा चन्दन आदि के वृक्ष भारतीय बांगमय के धार्मिक तथा सांस्कृतिक परिवेश के अंग बन गए है। वृहदारण्यक उपनिषद में वृक्षों को मानव की भांति माना गया है। पदमपुराण में वृक्षों को ईश्वर का अंश मानकर उनकी पूजा का विधान है ईश्वर के विराट स्वरूप का दर्शन करते हुए मुनि शुकदेव ने राजा परीक्षित से कहा था हे राजन! नदियां विश्व-मूर्ति विराट पुरूष (ईश्वर) की नाड़ियां है, वृक्ष रोमकूप है वायु श्वास है काल गति है तथा गुणों का प्रवर्तन ही उनका कर्म है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार समुन्द्र में खडे़ होकर तप करने के बाद जब प्रचेता बाहर निकले तथा अपनी आवश्यकात को पूर्ण करने के उदेश्य से जब वृक्षों तथा वनों को काटना आरम्भ किया तो ब्रह्म ने स्वयं प्रकट होकर उनसे मना किया कि यह वसुन्धरा हिरण्य गर्भा है उसकी रक्षा हेतु वनस्पति अत्यन्त आवश्यक है। अत वृक्ष मत काटो।

जब घने पत्तों से हरे-भरे वृक्ष हो पृथ्वी “हरियाई” यानी हरी भरी हो पौधों पर रंग बिरंगे फूल फल खिले हों लताएं हवा के झोंके से इठला रही हो तभी इस सावन का आनंद है महत्व है। अगर यह सब पर्याप्त नही वृक्षों को कुल्हाड़ी चलाकर मृत्यु दंड दे दिया गया हो पौधे उखाड़ कर फैंके हो न पेड को जल जीवन दिया हो न घर आंगन, बगीचे में पौधो को पीला हो तो कैसा सावन? कैसा जीवन? यह कहने का मर्म तथा अर्थ अभिप्राय समझ गये होंगे! आखिर वृक्षों, पौधों को किस अपराध की सजा दी जा रही है? क्या छाया करना, धूप तथा वर्षा से बचाना, फल-फूल देना, ऊर्जा बांटना, कार्बन डाई आॅक्साईड को सोख कर पर्यावरण को स्वच्छ शुद्ध रखना आदि अपराध है?